न्यूयार्क। संयुक्त राष्ट्र में आयोजित परमाणु अप्रसार संधि एनपीटी की एक महीने तक चलने वाली अहम बैठक शुरू हुई। बैठक की शुरुआत में 34 देशों के प्रतिनिधियों को उपाध्यक्ष चुना गया, जिनमें ईरान का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। अमेरिका के कड़े विरोध के बावजूद ईरान को यह पद मिलना वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम तो है ही साथ ही इसे अमेरिका, इस्राइल और सऊदी अरब के लिए एक झटका भी माना जा रहा है। हर पांच साल में होने वाली इस प्रक्रिया के तहत एक अध्यक्ष और 34 उपाध्यक्ष चुने जाते हैं। इस बार वियतनाम को अध्यक्ष बनाया गया है, जिसे चीन और रूस का करीबी देश माना जाता है। ईरान का उपाध्यक्ष बनना कूटनीतिक समीकरणों में बदलाव का संकेत दे रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने आखिरी समय तक ईरान को उपाध्यक्ष बनने से रोकने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। ईरान को 121 देशों का समर्थन मिला, जिसके चलते उसे यह पद हासिल हुआ। गुट निरपेक्ष देशों ने ईरान के पक्ष में मजबूती से समर्थन दिया। अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने इसका विरोध किया, लेकिन उनका रुख प्रभावी नहीं हो पाया। इस मसले पर अमेरिकी शस्त्र नियंत्रण और अप्रसार ब्यूरो के सहायक सचिव क्रिस्टोफर येव ने इसे एपीटी के लिए अपमानजनक बताया। उन्होंने कहा कि ईरान लंबे समय से परमाणु अप्रसार से जुड़े दायित्वों का सम्मान नहीं करता रहा है। ऐसे देश को नेतृत्व की भूमिका देना संस्था की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकता है। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि यह फैसला एनपीटी की साख पर सवाल खड़े करता है और इससे वैश्विक परमाणु नियंत्रण व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
इस पर ईरान ने अमेरिका के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के दूत रजा नजाफी ने अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा कि दुनिया में परमाणु हथियार का इस्तेमाल करने वाला एकमात्र देश अमेरिका ही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका अपने परमाणु हथियारों के भंडार को लगातार बढ़ा रहा है, इसलिए उसे दूसरों पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है। ईरान कहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उस पर लगाए गए आरोप राजनीतिक प्रेरित हैं।
परमाणु अप्रसार संधि की शुरुआत 1970 में शीत युद्ध के दौरान हुई थी, जब दुनिया परमाणु युद्ध के खतरे से जूझ रही थी। इसका मुख्य उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और वैश्विक शांति बनाए रखना है। यह संधि संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में काम करती है और वर्तमान में 190 से अधिक देश इसके सदस्य हैं, जिनमें ईरान भी शामिल है।
मालूम हो कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ही फरवरी के आखिरी हफ्ते में दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही थी, इसी बीच अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया, तब से काफी नुक्सान हो चुका है और पूरी दुनिया की हालत खराब हो गई है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य से अपनी नाकेबंदी नहीं हटाएगा तब तक ईरान भी अपनी नाकेबंदी जारी रखेगा। अमेरिकी जोर-जबरदस्ती से यूरोप और बाकी दुनिया के लोग अमेरिका से नाराज हैं।
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