वॉशिंगटन। इस्राइल और अमेरिका ने ईरान की सैन्य शक्ति को कम और अपनी शक्तियों को सुपर मानते हुए हमला तो कर दिया लेकिन जब ईरान ने पलटवार किया तो न सिर्फ अमेरिका और इस्राइल बल्कि दुनिया के बाकी देश भी दंग रह गए। अमेरिका खाड़ी देशों में अपने अड्डे और इस्राइल खुद को पूरी तरह ईरान से नहीं बचा पाया। वजह शायद इन दोनों देशों का बचाव सिस्टम ईरान के मुकाबले कमजोर था। दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति माने जाने वाले अमेरिका की एयर डिफेंस प्रणाली को लेकर पिछले दिनों एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि मौजूदा रक्षा प्रणाली आधुनिक खतरों, खासकर हाइपरसोनिक और क्रूज मिसाइलों के सामने प्रभावी नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब चीन, रूस, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों की सैन्य क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं और वे नई तकनीकों से लैस हथियार विकसित कर रहे हैं।
सोमवार को अमेरिकी संसद के सामने पेश हुए रक्षा अधिकारियों ने 2027 के बजट पर चर्चा के दौरान साफ कहा कि वर्तमान मिसाइल डिफेंस सिस्टम बड़े और जटिल हमलों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। अमेरिकी सहायक रक्षा मंत्री (अंतरिक्ष नीति) मार्क जे. बर्कोविट्ज ने बताया कि मौजूदा सिस्टम एक सीमित और एक-स्तरीय ढांचे पर आधारित है, जिसे मुख्य रूप से छोटे स्तर के बैलिस्टिक हमलों के लिए डिजाइन किया गया था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आज की परिस्थितियों में यह सिस्टम हाइपरसोनिक हथियारों और लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों जैसे नॉन-बैलिस्टिक खतरों से निपटने में लगभग अक्षम है।
अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक युद्ध अब पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ चुका है। चीन और रूस जैसे देश हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक में तेजी से प्रगति कर रहे हैं। ये मिसाइलें बेहद तेज गति से चलती हैं और दिशा बदलने में सक्षम होती हैं, जिससे उन्हें मौजूदा रक्षा प्रणालियों से रोकना मुश्किल हो जाता है। पेंटागन ने चेतावनी दी है कि इन उन्नत हथियारों के कारण अमेरिका की मुख्य भूमि तक सीधा खतरा बढ़ गया है। यही वजह है कि अब अमेरिका अपनी रक्षा रणनीति को पूरी तरह बदलने की दिशा में काम कर रहा है।
नई चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिका एक नई और अत्याधुनिक रक्षा प्रणाली गोल्डन डोम विकसित करने की योजना बना रहा है। यह एक मल्टी-लेयर (बहु-स्तरीय) एयर डिफेंस सिस्टम होगा, जिसकी अनुमानित लागत 175 से 185 बिलियन डॉलर के बीच बताई जा रही है। इस परियोजना में अंतरिक्ष आधारित सेंसर, जमीन पर तैनात इंटरसेप्टर मिसाइलें, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कमांड सिस्टम और डायरेक्टेड एनर्जी (जैसे लेजर) हथियारों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका उद्देश्य ड्रोन, क्रूज मिसाइल, हाइपरसोनिक हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल समेत हर प्रकार के खतरे से एक साथ निपटना है।
बताया जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस नई रक्षा योजना को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर चुके हैं। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ जल्द ही सीनेट की आर्म्ड सर्विसेज सबकमेटी के सामने पेश होकर पेंटागन के लगभग 1.5 ट्रिलियन डॉलर के बजट का बचाव करेंगे। इस बजट में गोल्डन डोम जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भारी निवेश का प्रस्ताव शामिल है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका को अपनी रक्षा क्षमताओं को नई तकनीकों के अनुरूप ढालना बेहद जरूरी है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की निगरानी अमेरिकी स्पेस फोर्स के जनरल माइकल ए. गुएटलाइन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और अब अमेरिका के पास पहले जैसा सुरक्षा मार्जिन नहीं रहा। गुएटलाइन के अनुसार, एक पीढ़ी में पहली बार ऐसा हो रहा है जब अमेरिका की मुख्य भूमि पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा सकती। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वर्तमान में देश का सुरक्षा कवच अधूरा है और इसे मजबूत करना समय की मांग है। अधिकारियों का लक्ष्य है कि गोल्डन डोम सिस्टम को 2028 तक आंशिक रूप से लागू कर दिया जाए।
रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्वीकारोक्ति अमेरिका की रक्षा नीति में बड़े बदलाव का संकेत है। अब तक अमेरिका अपनी तकनीकी श्रेष्ठता पर भरोसा करता रहा है, लेकिन नई परिस्थितियों ने उसे अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया है। गोल्डन डोम जैसी परियोजना न केवल अमेरिका की सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि वैश्विक हथियारों की होड़ को भी तेज कर सकती है। इससे अन्य देश भी अपनी रक्षा तकनीकों को और उन्नत करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।
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